Saturday, January 5, 2019

"वो पढ़ते ही मर जाएँगे"

है रंगों में लहू तो बहाकर दिखाएँगे
   अपने देश के लिए जिएँगे
  और लङते लङते मर भी जाएँगे,

कुछ हो न हो बस नाम कमाने
   की चाहत है
आज मौत आए या कल आए
   तमन्ना एक ही है
कफन बस तिरंगा का ही ओढ़कर जाएँगे,

है लहू में गर्मी उसकी
तपन भी दिखाएँगे
दुश्मनों की औकात क्या है
उनको वो भी दिखाएँगे,

देश के जो हैं गद्दार उन्हें
खुद्दारी सिखाएँगे
उनके लिए ऐसे शब्द लिखेंगे
कि वो पढ़ते ही मर जाएँगे,

ओज से दहकते अंगार सा लेख
शिवम यादव "अन्तापुरिया" का
9454434161

Thursday, January 3, 2019

Check out @OshayarShivam's Tweet: https://twitter.com/OshayarShivam/status/1069340788730015744?s=09

नवगीत

           "  पत्थर दिलों की यादें "

मुझे वक्त याद आया
      पत्थर बना रहा हूँ
उन जख्मों वाले घावों
  पर मरहम लगा रहा हूँ
मेरा तर बतर ये होना
मेरे जीवन की है ये गवाही
छाँव के नीचे धूप से
    मैं पिघला जा रहा हूँ
उम्मीद की वो राहें
      छूटी नहीं हमसे
तेरी यादों में अब तक आशूँ
          बहा रहा हूँ
तेरे कहे वो लफ्जों को
  अपने होंठों से भुला रहा हूँ
मुझे जोङ करके
तोङा उनको...
    वही भुला रहा हूँ
इतना भी याद रखना
जो प्यार था मेरा झूठा
तो अब तक खुद को
   क्यों रूला रहा हूँ
प्यार के शहर में रहकर
अब नफरत जगा रहा हूँ
बिछङे पत्थर दिलों की
   यादों में
अन्तापुरिया
नवगीत लिखा रहा हूँ

अन्तापुरिया

"* रचना *"

         " कफन बन गया हूँ"

जिंदगी थी मेरी असरदान होना
   होती है चाहत नजरों का मिलना
मोहब्बत में जैसे तपन का है उठना
     गर्मी में वैसे बरफ का पिघलना
जीवन में जैसे साँसों का रूकना
       सर्दी में मानुष के तन का सिकुङना
जिंदगी थी.....

ढलता शरीर है जिंदगी को जीकर
    जैसे हो बहते नदियों का रूकना 
बनता-बिगङता मैं उठ गया हूँ 
      तुम्हारे लिए बस मैं जी रहा हूँ   
मोहब्बत बनीं है सदा से पहेली
       मानो हो जैसे जंगल-जलेबी 
दलदल में होगा फसलों को उगना
  यही जिंदगी में मेरा है सपना 
जिंदगी थी...
सही था गलत मैं सबकुछ हो गया हूँ 
   नजरों में तेरी तलब हो गया हूँ 

कुछ वजह थी "अन्तापुरिया" के दिलों का     
              बिछङना
गलत था तुम्हारा मेरी नजरों से डरना  
डरना डराना सभी को है आता
हँसना-हँसाना सभी को न है आता
   हँसने हँसाने से डरने लगा हूँ 
तेरी जिंदगी का कफन बन गया हूँ
जिंदगी थी...

~ शिवम यादव अन्तापुरिया

तेरे लिए

             " तेरे हो गए "

तेरे लिए हम तेरे हो गए हैं 
मोहब्बत में तेरे दफन हो गए हैं 
दीयों का साया सारे जहाँ में
तुम्हारे लिए ये अमर हो गया है

मोहब्बत में तेरे छलके जो आशूँ
मोहब्बत का तेरी यही सिलसिला है
तेरे लिए...

नफरत की डालों पर बैठे परिन्दे
उनको उङाना कठिन हो गया है

"अन्तापुरिया"
   देखा था तुमको पहले जब मैंने
लगा रेतों में जैसे चमन खिल गए हों

तुझमें देखी अजब सी जब चाहत
लगा चाहत में तेरी दफन हो गए हो
       तेरे लिए हम तेरे हो गए हैं...
~ शिवम यादव अन्तापुरिया

Saturday, December 29, 2018

देश भक्ति पर कविता

            ''शान बनाए रखना''

भारत में सुन्दरता बहती है
नदियाँ भी गीत सुनाती हैं
ये देश है वीर जवानों का
जिसका दुनियाँ गुण गाती है,

रंग रूप बदलते रहते हैं
     अंजाम बदलते रहते हैं
भारत सोने की चिङिया है
  सोने सी ही चमक वो रखते हैं,

  भारत को रंगीन बनाया है
   वीरों ने अपना लहू बहा करके
इसकी शान बनाए रखना है
           अपना शीश कटा करके,

देशभक्ति से ओत-प्रोत
     हम सब भारतवासी हैं
दुश्मन को धूल चटाने को
       हम अकेले ही काफी हैं,

~ युवा लेखक/कवि
शिवम यादव अन्तापुरिया

जिंदगी और मौत की वार्तालाप

.जिंदगी से मौत और मौत से जिंदगी की वार्ता.

मौत जिंदगी से हँसकर बोली
अरे री मैं हूँ तेरी सहेली,

दुनियाँ हमसे करती है नफरत
पर तुमको बना लेती है पहेली,

जिंदगी के मेरे जीवन कुछ
   इरादे और ख्वाब होते हैं
   तेरी वजह से जीवन के
हर वादे भी पूरे नहीं होते हैं,

मौत ने कहा मैं गरीब-अमीर
दोनों को समान देखती हूँ
तुम दोनों को भिन्नता से,

आखिर दुनियाँ का कङुवा
    सच तो मैं हूँ...
बस यही कारण है
मुझे लोग दुतकारते हैं
   तुम्हें पुचकारते हैं,

मनुष्य से सम्मान
पाने के बाद भी..
तुम उन्हें वो जगह
नहीं दे पाती हो,

दुतकारने के बावजूद भी
मैं उन्हें स्वर्ग पहुँचा देती हूँ...

~ युवा कवि/लेखक
शिवम यादव अन्तापुरिया