इनका जन्म उत्तर प्रदेश में सन्1998 में हुआ
जीवन शुरुआत से ही संघर्षपूर्ण रहा,
लेकिन लेखन में रूचि होने के कारण इनको साहित्य से इतना स्नेह हुआ कि
अपनी ग्रेजुएशन की शिक्षा की ओर इतना पुरजोर नहीं दिया जितना की साहित्य पर ध्यान देने लगे और निरंतर तीन साल की मेहनत से तीन किताबें लिखीं जिसमें बहुत आपाधापी के चलते एक काव्य संग्रह "राहों हवाओं में मन" 2018 में प्रकाशित हो पाया,
स्वंम की आर्थिक स्थिति भी इतनी अच्छी नहीं थी,
जबकि इनका जन्म पुराने राजघराने में हुआ था
फिर भी सादगी पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे थे
ज्यादातर स्वयं पर ही निर्भर रहने की सोच रखते हैं।राजघराना किसानी परिवार से ताल्लुक होने चलते इनका लगाव खेती से भी रहा है पहली किताब में इन्होंने अपने आसपास और खेत खलिहानों के परिवेश को सुशोभित किया है। अपने संघर्ष पूर्ण जीवन की कई बातें अभी भी वो बताने से संकोच करते हैं
वैसे तो इनका पूरा नाम-
शिवम यादव रामप्रसाद सिंह "आशा" अन्तापुरिया है
लेकिन अपने छोटे से 20 साल के जीवन में ही इन्होंने कई उपनाम पा लिए हैं
जिसका सीधा सा उद्देश्य है कि हर विधा में ये अलग -अलग नाम से जाने जा सकते हैं
जैसे
इन्होंने मोह का त्याग कर दिया है
जिससे "निर्मोही" भी कहते हैं
अपने पैतृक गाँव अन्तापुर के नाम से अपना उपनाम "अन्तापुरिया"
से भी जाने जाते हैं
मेरे ख्याल से भविष्य में इन्हें कई उपनाम मिलने की संभावना है....
शिवम यादव अन्तापुरिया
"निर्मोही"
I am a Poet & Writer . मैं काव्य-संग्रह और मुक़्तक लिखता हूँ I मुझे लिखने में मज़ा आता है , धन्यबाद I
Sunday, January 27, 2019
शिवम यानी निर्मोही का सफर
तिरंगा ही कफन हो
मैं लङते-लङते मर जाऊँगा
लेकिन शीश नहीं झुकाऊँगा
चाहें भले ही मौत से ही
क्यों
न हो मेरा सामना
हँसते-हँसते उससे भी
उलझ जाऊँगा,
चाहे कुछ भी मुझे करना पङे
तिरंगा के कफन पर ही
अपना नाम लिखाऊँगा,
चाहें जीत की दहलीज हो
या मौत सरहद पार हो
मगर तिलक भारत की
मिट्टी का ही लगाऊँगा,
चाहें दुश्मन की
गोली का निशाना हो
या मौत को गले
लगाना हो
हूँ नहीं मैं लौटने वाला
चाहें लाखों जख्मों से
मेरा सामना हो
क्यों न आया ऊपर से
पर परवाना हो
~ शिवम अन्तापुरिया "निर्मोही"
Tuesday, January 22, 2019
" जी रहा हूँ "
है हर घङी इंतजार उसका
है कहाँ सुकूँ अब दिल का
जी रहा हूँ आफता हूँ
है हर घङी पल बेदखला सा
चल रही है ये जिंदगी
रफता-रफता हम सफर सा
जी लूँगा जिंदगी को
चाहें बीते हर दिन मौत सा
कर रहा हूँ खौफ खुद से
खुद पता है न कारण इसका
जी रहा हूँ हँस रहा हूँ
हो रहा है साथ सबकुछ ख्वाब सा
" कस्तियाँ ख्वाबों की "
मेरे ख्वाबों की कस्तियाँ
आती ही रहेंगी
वो मिलें न मिलें इश्क में कुछ हस्तियाँ
खाक होती रहेंगी
इश्क के शहर में दर्द को भी
दवा का नाम दे दिया
इसी डर से मैंने जिंदगी से
इश्क को बेदखल सा कर दिया,
कोरे-कोरे पन्नों पर लिखना तुमको
ही पङेगा
ये सवाल हैं सारी जिंदगी के
उत्तर गलत हो या सही
देना तुम्हें ही पङेगा,
आजकल के लङकों पर व्यंग्य
आजकल के लङके माँ-बाप को छोङकर
प्रेमिकाओं की सेवा करने लगे,
लङकियों ने दो लब्ज प्यार से क्या बोले
खुद को पत्नी महसूस करने लगे,
आजकल के लङके खुद को पत्नी महसूस करने लगे...
माँ-बाप की सेवा का फर्ज भूले
लङकियों पर जान न्योछावर करने लगे
खुद पर खुद का अधिकार न रहा
खुद को लङकियों की प्रापर्टी समझने लगे,
आजकल के लङके खुद को पत्नी महसूस करने लगे...
बंदरगाहों पर मिलते बादलों की तरह
चंद प्यार को दिन के तारे समझने लगे,
आजकल के लङके माँ-बाप को छोङकर प्रेमिकाओं की सेवा करने लगे...
बदला जमाना रो रोकर लङकियों से मिन्नतें
लङके माँगने लगे..
न जाने क्यों वो लङकियों को
प्यार का देवता समझने लगे
आजकल के लङके खुद को पत्नी महसूस करने लगे...
लेखक-
~ शिवम यादव अन्तापुरिया पुत्र रामप्रसाद सिंह "आशा"
अब घायल हिमालय को न होने दो
अब घायल हिमालय को न होने दो
दुश्मन चाहें जितनी बरसा ले गोलियाँ
सब मेरे सीने में जाने दो...
अब घायल हिमालय को न होने दो...
दृढ़ संकल्पिल रखना है
भारत माता के मुकुट को
आँधी, तूफाँ,भूचाल, बवण्डर को
सब मेरे ही सीने से टकराने दो
देशप्रेम ही मेरा महासमर है
भारत माँ को आँख दिखाने वाले पर
अब मुझको भी हाथ चलाने दो
अब घायल हिमालय को न होने दो...
भरतभूमि की देशभक्ति पर
अब कोई और दाग न आने दो
चाहें जितने बलिदान हों
सबसे पहले मुझको शीश कटाने दो
अब घायल हिमालय को न होने दो...
~ शिवम यादव अन्तापुरिया
द्वारा लिखित इस गणतंत्र दिवश को समर्पित