Monday, December 3, 2018

आज के समय में समाप्त हो रही मर्यादा"

गौरक्षा गौरक्षा का डंका पीटने वालों जरा इस ओर भी ध्यान दो,
बुलंदशहर जैसी घटना कोई अन्य स्थनों पर भी जन्म न ले ले इससे पहले इस पर अंकुश लगा लें,
कोई भी इतिहास को उठाकर देख लो राजा- महाराजाओं के पन्नों को खोलकर पढ लो
राजा विराट हो या राजा नल या श्रीकृष्ण का उदाहरण ले लो,
सभी के पास गायों के गौशाला थे
अब आज का इतिहास देखो
बात प्रदेश की हो या देश की
जो सत्ता में है वो ही प्रजा का राजा होता है
गौरक्षा का भाषण देने से पहले अपने आप में उस नेता या मंत्री को सोचना चाहिए कि खुद ने कितनी गायों को पाल रखा है या आवारा गायों का कोई अच्छा प्रबंध किया है जिससे न गाय को और न ही किसान कोई समस्या हो,
जबाव दो  ! योगी जी, मोदी जी, मोहनभागवत
और आरएसएस वाले सिर्फ दिखावटी हाफ चड्डा पहने हुए हिन्दू धर्म की लत्तालतीफी ही करने में लगे हैं
गाय हमारी माता है, सब जानते है लेकिन जब आधुनिक युग में हर माँ को माँ होने का अधिकार व सम्मान नहीं मिल पा रहा है अपने पुत्रों द्वारा, तो गाय को कैसे मिल पाएगा
गाय गाय गाय पर तो सब डीगें मारते है कभी बछङों की तरफ भी ध्यान है कि नहीं
जब से योगी ने भैंसों की कटान पर रोक लगाई तब से बहुत परेशानी का सबब किसान झेल रहे हैं
मुझे जबाव दो राजा भी तो शिकार खेलने जाते थे तो क्या वो हत्या नहीं होती थी,
जबाव दो
अगर इतने ही दयालु हैं आप तो ये बताओ जो आपके गले में रैलियों में फूलों का माला डाला जाता है वो फूल भी तो सजीव होते हैं
अगर फूल के जीवों की जान को नजरअंदाज कर देते हो तो वैसे हर व्यक्ति की सोच अलग है अपने अपने दृष्टिकोण से काम करता है और मैं गायों और भैसों के कटान के पक्ष में तो नहीं कह रहा हूँ, लेकिन पुराने समय में देखो सारे राज्य के आवारा पशुओं का सटीक प्रबंध होता था और राजा का गौशाला भी, आखिर योगी आप तो पूरे यूपी के राजा ही हैं सारे आवारा पशुओं को अपना गौशाला बनवाकर उसमें रखो ,नहीं तो हर तहसील में मवेशी खाना खुलवा दो जिससे आवारा पशु उसमें रखे जा सके,
एक नजर यहाँ करें...
पहले पुलिस को देखकर लोग डरते थे आज नहीं डरते सीधे उलझ जाते हैं जान लेने और देने पर तुल गए हैं आखिर जो पुलिस अधिकारी मर रहें है उनके भी बच्चे पत्नी हैं आप रूपये ही दे पाएँगे न कि किसी का उजङा सुहाग आपके पैसों से खिल पाएगा, इसलिए बता रहा हूँ मर्यादा खतम हो रही जनता किसी से डरती नहीं क्योंकि अपना खून पसीने की कमाई खाती है,और चुनावीआपदओं से हैरान होकर ही वो ऐसा कदम उठाती है,
नेता जब मंच पर होता है तो लगता है इसके अंदर जनता के हित का टैरिफ डला है,
मंच से उतरते ही उसकी वैधता खतम सी हो जाती है,
जनाब जनता इसलिए गुस्से में नजर आती है,
आपने तो कह दिया कटान बंद,
ये बताओ
किसान पशुओं को लाभ के लिए ही रखता है जहाँ उसे लाभ न होगा तो वो उसको फालतू में बाँधकर क्यों चारा खिलाएगा,
बछङा बिचेगा नहीं तो वो रखेगा क्यों
आज आप जरा किसानों के खेतों का दौरा करके जरा देखें खेतों की हालात खस्ताहाल सी हो गई है???..
मेरी तो आँखें नम हो जाती हैं जब मैं उन आवारा मासूम से बछङे व छोटी सी बछिया को कङाके की सर्दी में ठिठुरता देखता हूँ तो कहीं उनके पैर टूटे और गर्मियों में प्यास से भी मरते देखा है क्योंकि उनको पानी कहाँ से मिले जब मैं इतना बङा 20साल को हो गया कभी यहाँ के नहर वबम्मा में लगातार 15 दिन भी पानी नहीं देखा है और यहाँ तक मैंने कई गाय, बछङों को अपने आँखों के सामने ब्लेड वाले तारों से कटती व कराह भरते हुई मरते देखा है
अब मेरे सहन के बाहर तब ये आज लिख रहा हूँ गुस्सा उनपर भी आता है जिन्होंने इन्हें छोङा है लेकिन
"मजबूरी व्यक्ति को मजबूर कर देती है"
ये मेरा मानना है
किसान छोङे न तो करे क्या चारा की भी तबाही चल रहीहै, और कोई इन्हें खरीदता भी नहीं है
आवारा पशुओं के बोल....

    हम तो आवारा थे
आवारा ही हो गए,
पहले भूख मिटाने को जंगल थे
अब वो भी छिन गए,
प्यास मिटती नहीं,
भूख थमती नहीं,
और पास कुछ भी नहीं,
है तो एक छोटी सी  'जान'
जो तङप-तङप कर भी
निकलती नहीं!!
  लेख:-
युवा लेखक/कवि/विचारक/चिंतक
शिवम यादव "अन्तापुरिया"

Friday, November 16, 2018

! रिश्वत ! पर कुछ बोल

          ! जनाब !
रिश्वत माँगी नहीं दी जाती है
जब तक अपनी दी हुई रिश्वत से
अपने ही इशारों पर सारे काम
होते रहें,
हम मुँह खोलने की कोशिश भी
        नहीं करते हैं

बङी रिश्वत देने वाला तुम्हारे
काम को रोककर अपना काम
करवा या नौकरी पा लेता है
उस दिन हम रिश्वत का ढिंढौरा
       पीटने लगते हैं

ओ रिश्वत की साए में पलने वाले जनाब
अब जरा अपने दिल पर हाथ
रखिए
कितने योग्य लोग आपकी रिश्वत
के तले अपनी योग्यता साबित
नहीं कर पाए
और आप रिश्वत के दम पर
यहाँ तक चले आए

कितनों के दिल दुखाए हैं आपकी रिश्वत ने
ये आपको नहीं पता
ये हम आम लोगों से पूँछों.....

        
        लेकिन हकीकत ये है
   इस रिश्वत को पालते भी हम हैं
और मिटाने की कोशिश भी करते हम हैं
        पोषते भी हम हैं

इसको बलवान भी हम बनाते है
जिस दिन रिश्वत की छुरी खुद पर
    चल जाती है उस दिन इसे
       कोशते भी हम हैं

      रिश्वत अच्छी भी है
          खराब भी है
     बेबुनियाद भी है
और हाँ रिश्वत एक फरियाद भी है
जब मुझपर कोई झूठा अपराध दर्ज
    किया जा रहा होता है
तब ये न्याय पाने के लिए रिश्वत ही काम
          आती है
      तभी मैं कहता हूँ ,
पालते भी हम हैं पोषते भी
            हम हैं
लेखक:-
~ शिवम यादव अन्तापुरिया
   रिश्वत पर बोल के साथ पेश हैं....

हम शेरों के घाव

हम शेरों के ये घाव होते ही रहते हैं

          जिन्हें भरते नहीं वो भर ही जाते हैं

युद्धवंशी हूँ सामर्थ युद्ध का जिगर में है

    हाथों में जंजीरें भी हो तो भी लगता है

          कि धागों की गिरफ्त में हैं 
यही तो बहादुरी हम यादवों के फितरत में है

Saturday, November 10, 2018

इश्क है उसे

मेरे हालात से क्या होगा
  बिखरे अलफाज हैं उसके

चंदन समझ करके मिट्टी को
माथे पर तिलक है उसके

सच्चा गवाह था एक ही मेरा
हजारों झूठे गवाह हैं उसके

    करूँ क्या आरजू मंन्नत
हजारों बेदर्दी, बेरहम चेहरे हैं उसके

     कहे अन्तापुरिया आज खुद से
चलो तुमको भी मुलाकात करा दें बेहया चेहरे से उसके

~  »शिवम अन्तापुरिया....

वहाँ जाने से

1- मेरे कदमों के जाने से तेरे कदमों के आने से
बने थे पग जमीं पर जो निशाँ से वो मिटाने के

2-न रूकता हूँ न ठहरता हूँ
         बस खुद को समझाता हूँ
दिल चलने को रोकता है
   मगर पगों से चलता चला जाता हूँ

3-दिल से खामोश मन से परिंदा हूँ
          उसे देखूँ जहाँ भी मैं
  उधर उङता सा जाता हूँ
     वो दूरी क्या वो मंजिल क्या
खबर इसकी न होती है
      फिर भी हजारों लोगों में
      उसकी पहचान होती है
आवारा क्वाॅरा हूँ न कोई मतभेद दिल में है
दीवाना न आशिक हूँ बस राही पथिक का हूँ
.................
   ~  शिवम अन्तापुरिया
कुछ पंक्ति आपके समक्ष

कविता शिवम अन्तापुरिया की ठोस कदम न्यूज अखबार में प्रकाशित हुई है

! मैं इंशान हूँ मुझे इंशान बनने दो !
फजीहत में मुझे बर्बाद न होने दो !!

Thursday, November 1, 2018

''किसान'' मजबूर हूँ

मैं मजबूर हूँ
   मैं मगरूर हूँ
क्यों सजा मुझे मिल रही है
      मैं बेकशूर हूँ,

अभी तक प्राकृतिक आपदाओं
से तबाह होता रहा है
अब फसलों पर कहर बरपाया
जाता है
चुनावी रैलियों की आपदाओं से

क्यों सजा मुझे मिल रही है
मैं बेकशूर हूँ

मैं नादान नहीं
     मैं अनजान नहीं
सबकुछ जानकर भी दबंग
      नेताओं के डर से चुप रहता हूँ
मैंने कई ऐसे दृश्य देखें हैं
   नेताओं ने अपने दौलत के बोझ तले
सैंकङो बेगुनाहों किसानों को कुचल डाला है
    जिनकी न कभी अखबार में खबर
                छपती है ??
      न उनका नाम लिया जाता है
क्यों सजा मुझे मिल रही है
     मैं बेकशूर हूँ
                          ~ शिवम अन्तापुरिया
व्यंगात्मक शब्द.....
ऐसे ही बिखरे शब्दों को जोङता रहूँगा....