का आभारी हूँ
I am a Poet & Writer . मैं काव्य-संग्रह और मुक़्तक लिखता हूँ I मुझे लिखने में मज़ा आता है , धन्यबाद I
Friday, November 29, 2019
न पता था
"न पता था"
ये क्या प्यार में था
सही और गलत था
नज़रे मिली वो
तुम्हारा हुआ था
प्यार की राह में उसे न
दिन-रात का पता था
चल दिया है किधर वो
न इस राह का पता था
न जात का पता था
न पात का पता था
कब हुए एक दूसरे के
न इस बात का पता था
रचयिता
शिवम अन्तापुरिया
उत्तर प्रदेश
हैं रूकते नहीं
"हैं रूकते नहीं"
हारे हिम्मत अगर
इस जहाँ में पुरुष
देखकर मेरा मन
पिघल भी जायेगा
सोचता हूँ मैं कैसा
इरादा होता है इनका
दृढ़ और अटल सारे
गमों को भुला जाएगा
कितनी भी बड़ी हो संवेदना
कितनी भी बड़ी हो वो वेदना
पैर मर्दों के हैं रूकते नहीं
हर दुखःड़ा कलेजे में समा जाएगा
रचयिता
शिवम अन्तापुरिया
उत्तर प्रदेश
अधूरा साथ
"अधूरा साथ "
जिन्दगी ये मेरी कोई शीशा नहीं
खेलकर तोड़ दो है खिलौना नहीं
वर्षों लगी हैं मुझे सजाने में इसे
छोड़कर जाऊँ कोई है मकाँ नहीं
बेजह तुम बनें जिन्दगी यूँ रहे
साथ मेरे करते खिलवाड़ क्यों रहे
हम तो अकेले थे बनें रहने देते
अधूरा साथ मुझको देते क्यों रहे
रचयिता
शिवम अन्तापुरिया
उत्तर प्रदेश
राह कहाँ छोड़ी है
"राह कहाँ छोड़ी है"
आज छोटी उड़ाने गगन चूम लें
मिलकरके ऐसा एक संकल्प लें
जीत मिलती सदा उन्हीं को यहाँ
जो अपने हौंसलों को दृढ़ कर लें
लोग कहते हैं कर पाएगा ये क्या
अपने जज्बातों को दिखा दो यहाँ
भरा है क्या मेरे दिल में जुनूँन
सफलता इन्हें भी दिखा दो यहाँ
अभी काम व पहचान छोटी है
शोहरत की गली थोड़ी छोड़ी है
चलते जाएँगे बढ़ने की राह में
सफलता की राह कहाँ छोड़ी है
रचयिता
शिवम अन्तापुरिया
उत्तर प्रदेश
Sunday, November 24, 2019
गीत
" गीत "
1- छोड़ कर प्यार की
राह तुम चल दिए
इस कदर तेरा जाना
न हम सह सके...
2- अब है जाना तुम्हें
तो चले जाइए
अब ये नज़रे न
हमसे मिलाना कभी...
छोड़ कर प्यार की
राह तुम चल दिए
इस कदर तेरा जाना
न हम सह सके...
2- न ही हम दूर थे
न ही तुम दूर थे
एक दम क्या हुआ
तुम बिखर से गए....
छोड़ कर प्यार की
राह तुम चल दिए
इस कदर तेरा जाना
न हम सह सके...
2- कोई दीवाना कहे
कोई फ़साना कहे
तुम मोहब्बत में
कैसे जकड़ से गए...
छोड़ कर प्यार की
राह तुम चल दिए
इस कदर तेरा जाना
न हम सह सके...
रचयिता
शिवम अन्तापुरिया
उत्तर प्रदेश
गजल
" गजल "
लोग इनको जला राख कर देते हैं।
ये घरौंदे कभी हैं बिगड़ते नहीं।।
आग घर की हो या फ़िर सियासत की हों
इनकी लपटों से हैं कोई बचता नहीं...
लोग इनको जला राख कर देते हैं।
ये घरौंदे कभी हैं बिगड़ते नहीं।।
लोग रहते जमीं आसमाँ पर जो हों
आज ख्वाबों में घर ऐसे बनते नहीं...
लोग इनको जला राख कर देते हैं।
ये घरौंदे कभी हैं बिगड़ते नहीं।।
तुमको चाहने वाले भी अंजान हों
ऐसी चाहत पे करना भरोसा नहीं...
लोग इनको जला राख कर देते हैं।
ये घरौंदे कभी हैं बिगड़ते नहीं।।
कोई बेकार है कोई लाचार है
दिल के दर्दों को कोई समझता नहीं...
लोग इनको जला राख कर देते हैं।
ये घरौंदे कभी हैं बिगड़ते नहीं।।
रचयिता
शिवम अन्तापुरिया
उत्तर प्रदेश
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